वैसे तो प्रोटॉन की खोज का श्रेय अर्नेस्ट रदरफोर्ड(Ernest Rutherford) को जाता है। लेकिन सबसे पहले परमाणु से निकलने वाले इस धनात्मक कण की किरण का प्रेक्षण यूजेन गोल्डस्टीन(Eugen Goldstein) ने किया था। बाद में रदरफोर्ड ने इस कण की पुष्टि की एवं इसको प्रोटॉन नाम दिया। इसलिए रदरफोर्ड को ही प्रोटॉन की खोज का श्रेय दिया जाता है।

परिचय (Introduction)

शुरुआत में परमाणुओं की खोज के बाद यह माना जाता था की पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु है एवं परमाणु को तोड़ा नहीं जा सकता है। लेकिन धीरे धीरे विज्ञान की तरक्की के साथ आंखिरकर परमाणु की संरचना एवं इसमें उपस्थित उप-परमाणविक (Subatomic Particle) पार्टिकल्स इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की खोज हो गई।

अगर आज हमसे कोई पूछता है कि परमाणु किस चीज से बना हुआ है तो हम बड़ी ही आसानी से कह देते हैं कि परमाणु न्यूट्रॉन, प्रोटॉन एवं इलेक्ट्रॉन से मिलकर बना होता है जिसके केंद्र में प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन मौजूद होते हैं जिसे हम नाभिक कहते हैं तथा इसी नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाते हैं।

परमाणु का चित्र
परमाणु का चित्र

लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था, हमे परमाणु की संरचना के बारे में कुछ भी पता नहीं था। वैज्ञानिकों ने बहुत से प्रयोगों के बाद एक एक करके इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन को खोज निकाला तथा परमाणु की संरचना का पता लगाया।

इसी क्रम में आज हम जानेंगे की प्रोटॉन की खोज किसने की थी और कैसे की थी (Proton ki khoj kisne ki thi)। तो चलिए शुरू करते हैं ये आर्टिकल।

प्रोटॉन क्या है (What is Proton in Hindi)

प्रोटॉन एक धनावेशित उप-परमाणविक (Subatomic Particle) कण है, इसे p से दर्शातें हैं। इसका द्रव्यमान 1.6726219 × 10-27 kg होता है जो कि लगभग न्यूट्रॉन के बराबर होता है।

प्रोटॉन पर उपस्थित आवेश का परिमाण(Magnitude) इलेक्ट्रॉन पर उपस्थित आवेश के परिमाण के बराबर होता है। लेकिन इन दोनों में उपस्थित आवेशो की प्रकृति एक दूसरे के विपरीत होती है।

प्रोटॉन पर +e = +1.602176634×10−19 C (कूलम्ब) का धन आवेश उपस्थित होता है और इलेक्ट्रॉन पर इतना ही -e = -1.602176634×10−19 C (कूलम्ब) का ऋण आवेश उपस्थित होता है। जबकि न्यूट्रॉन विद्युत आवेश रहित उदासीन कण है।

हर परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनो की संख्या तथा नाभिक के चारों ओर घूमने वाले इलेक्ट्रॉनो की संख्या बराबर होती है, इस प्रकार धनावेश और ऋणावेश का संतुलन हो जाता है और हर परमाणु अपनी सामान्य स्थिति में उदासीन होता है।

किसी परमाणु के नाभिक में मौजूद प्रोटॉनों की संख्या को उस परमाणु का परमाणु क्रमांक कहते हैं। इसे Zसे प्रदर्शित करते हैं।

प्रोटॉन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी

गुणमान
प्रोटॉन का द्रव्यमान1.6726219×10−27 kg
प्रोटॉन पर विद्युत् आवेश+ 1.602176634×10−19 C
खोज (Proton ki khoj kisne ki thi)पहले 1886 में गोल्डस्टीन ने ऑब्ज़र्व किया इसके बाद 1917-1920 में रदरफोर्ड द्वारा पूर्ण रूप से खोज लिया गया।
प्रतीकp, +p, +e
एंटी पार्टिकलएंटी-प्रोटॉन

दुनिया में हर परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन उपस्थित होते हैं। सभी परमाणुओं का नाभिक प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से मिलकर बना होता है। प्रोटॉन के धन आवेश के आकर्षण के कारण से ही ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉन परमाणु से बंधे होते हैं और नाभिक का चक्कर लगाते हैं। यानी कि परमाणु की संरचना को स्थाई बनाए रखने में प्रोटॉन भी एक अहम भूमिका निभाता है।

परमाणुओं के नाभिक में न्यूट्रॉन की उपस्थिति की वजह से एक से अधिक प्रोटॉन आपस में प्रबल नाभिकीय बल द्वारा बंधे होते हैं जो कि सबसे अधिक प्रबल बल है। यही कारण है कि प्रोटॉनो के बीच विद्युत आवेश की वजह से प्रतिकर्षण बल होने के बावजूद भी ये नाभिक में आपस में बंधे होते हैं।

आधुनिक भौतिकी (Modern Physics) के अनुसार प्रोटॉन पूर्ण रूप से मूल कण नहीं है बल्कि यह और भी छोटे अस्थाई सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है, जिन्हे क्वॉर्क कहते हैं। प्रोटॉन दो डाउन-क्वॉर्क तथा एक अप-क्वॉर्क से मिलकर बना होता है।

क्वार्क से मिलकर बना हुआ प्रोटॉन
क्वार्क से मिलकर बना हुआ प्रोटॉन, image source Wikipedia

यानी कि इसे और भी छोटे सूक्ष्म कणों में तोड़ा जा सकता है जिन्हें क्वॉर्क कहा जाता है। लेकिन क्वॉर्क अपने आप में बहुत ही अस्थाई कण हैं ये बनते ही तुरंत नष्ट हो जाते हैं यानी की क्षयित होकर ऊर्जा में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रोटॉन की खोज (Discovery of proton in hindi)

प्रोटॉन कि खोज किसने की थी (Proton ki khoj kisne ki thi)

वैसे तो प्रोटॉन की खोज का श्रेय अर्नेस्ट रदरफोर्ड(Ernest Rutherford) को जाता है। लेकिन सबसे पहले परमाणु से निकलने वाले इस धनात्मक कण की किरण का प्रेक्षण यूजेन गोल्डस्टीन(Eugen Goldstein) ने किया था। बाद में रदरफोर्ड ने इस कण की पुष्टि की एवं इसको प्रोटॉन नाम दिया। इसलिए रदरफोर्ड को ही प्रोटॉन की खोज का श्रेय दिया जाता है।

अर्नेस्ट रदरफोर्ड और यूजेन गोल्डस्टीन

प्रोटॉन की खोज कैसे हुई थी (Proton ki khoj kaise hui thi)

शुरुआत में वैज्ञानिक जानते थे कि परमाणु पर कोई भी विद्युत आवेश नहीं होता है, परमाणु विद्युत उदासीन होता है अर्थात परमाणु पर कुल विद्युत आवेश शून्य होता है।

उसके बाद सन 1897 में जे .जे .थॉम्पसन (J .J. Thompson) ने इलेक्ट्रॉन कि खोज कर ली थी तथा साथ ही यह भी बताया था कि इलेक्ट्रॉन एक ऋणावेशित कण है जिस पर -1.602176634×10−19 C(कूलम्ब) का ऋण आवेश उपस्थित होता है।

सभी वैज्ञानिक इलेक्ट्रॉन की खोज के बाद से सोच मे पड़ गए क्योंकि परमाणु तो विद्युत उदासीन होता है उस पर कोई भी आवेश उपस्थित नहीं होता है। लेकिन परमाणु में पाए जाने वाले कण इलेक्ट्रॉन पर ऋण आवेश उपस्थित होता है। यह कैसे संभव था, परमाणु विद्युत रूप से उदासीन लेकिन उसने पाए जाने वाले कण में ऋण आवेश।

तभी वैज्ञानिकों ने सोचा की परमाणु में कोई ना कोई ऐसा कण या कुछ ऐसी चीज जरूर मौजूद होनी चाहिए जिसके पास में इलेक्ट्रॉन जितना ही लेकिन प्रकृति में धनात्मक आवेश मौजूद हो, जिसके फलस्वरूप परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों का ऋण आवेश इस नए कण के धन आवेश से संतुलित हो जा रहा है, और परमाणु विद्युत रूप से उदासीन प्रतीत होता है। यानी कि परमाणु का कुल आवेश शून्य हो जाता है।

यहां पर सर जे .जे .थॉम्पसन ने आगे आकर अपना परमाणु मॉडल दिया जिसमे उन्होंने इस धनावेश की उपस्थित के बारे में बताया तथा व्याख्या करी कि किस प्रकार इलेक्ट्रॉन और यह धनावेश एक परमाणु में मौजूद होते हैं।

सरजे .जे .थॉम्पसन के परमाणु मॉडल के बारे में पूर्ण रूप से यहां क्लिक करके पढ़ें

लेकिन सर जे .जे .थॉम्पसन का यह परमाणु मॉडल कई चीजों को बताने मे असक्षम रहा व इसमें कई कमियां भी थी जिस वजह से यह परमाणु मॉडल फेल हो गया और इसे मान्यता नहीं दी गई। तथा धनात्मक आवेश वाले कण के लिए फिर से खोज शुरू हो गई

प्रोटॉन की खोज के लिए किए गए प्रयोग (Experiment for Discovery of Proton in Hindi)

इसके बाद सारे वैज्ञानिक इस धन आवेशित चीज की खोज की होड़ में लग गए।

इन सब घटनाओं से पहले ही सन 1886 में सर गोल्डेस्टीन ने परमाणु में धनात्मक कण के पाए जाने की बात कही थी तथा उन्होंने अपने प्रयोग में आंशिक तौर पर इस बात की पुष्टि भी कर दी थी।

यूजेन गोल्डस्टीन का प्रयोग (Eugen Goldstein’s Experiment for discovery of proton)

उन्होंने एक निर्वात/वैक्यूम ट्यूब ली जिसके एक सिरे पर तथा केंद्र पर उन्होंने धातु की एक-एक इलेक्ट्रोड रख दी। केंद्र में रखे हुए इलेक्ट्रोड में जगह जगह पर छोटे छिद्र थे।

जैसे की नीचे चित्र में दिखाया गया है छिद्र वाले इलेक्ट्रोड को बैटरी के ऋणात्मक सिरे से जोड़ा गया तथा सामान्य इलेक्ट्रोड को बैटरी के धनात्मक सिरे से जोड़ा गया।

यूजेन गोल्डस्टीन का प्रयोग
यूजेन गोल्डस्टीन का प्रयोग

इन दोनों इलेक्ट्रोड्स के बीच वैक्यूम ट्यूब में कम मात्रा में हाइड्रोजन गैस मौजूद थी, यानी कि इन इलेक्ट्रोड्स के बीच हाइड्रोजन के परमाणु मौजूद थे, जिनके केंद्र/नाभिक में सिर्फ एक प्रोटॉन मौजूद होता है और सिर्फ एक इलेक्ट्रॉन इस प्रोटॉन के चारो ओर चक्कर लगाता है।

जब परिपथ मे बैटरी की सहायता से उच्च विद्युत विभवंतार लगाकर विद्युत धारा को प्रवाहित किया गया तो इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक इलेक्ट्रोड से बाहर निकलकर धनात्मक इलेक्ट्रोड की ओर प्रवाहित होने लगे। इस दौरान ये इलेक्ट्रॉन वैक्यूम ट्यूब में मौजूद हाइड्रोजन परमाणुओं से टकराकर उसमे से इलेक्ट्रोन को निकल देते थे। इसके बाद सभी इलेक्ट्रॉन धनात्मक इलेक्ट्रोड की तरफ गति करने लगते थे जबकि बचा हुआ हाइड्रोजन का नाभिक जो की सिर्फ एक धनात्मक आवेशित प्रोटॉन होता है छिद्र वाले ऋणात्मक इलेक्ट्रोड की तरफ गति करने लगते थे।

कुछ हाइड्रोजन नाभिक (प्रोटॉन) इलेक्ट्रोड पर पहुंच जाते थे तथा परिपथ मे विद्युत धारा प्रवाहित करने में योगदान करते थे जबकि कुछ हाइड्रोजन नाभिक (प्रोटॉन) इलेक्ट्रोड में मौजूद छिद्र से आर-पार चले जाते थे और वेक्यूम ट्यूब के दूसरे सिरे की ओर गति करने लगते थे। ये प्रोटॉन सीधे किरण के रूप में गति करते थे और छिद्र वाले ऋणात्मक इलेक्ट्रोड के पीछे रखे ज़िंक धातु की प्लेट पर टकराकर चमक पैदा करते थे।

उस वक्त तक यूजेन गोल्डस्टीन एवं अन्य वैज्ञानिकों को ये पता नहीं था कि परमाणु में प्रोटॉन भी मौजूद होते इसलिए उस वक्त उन्होंने इस किरण को कैनाल किरण या एनोड किरण नाम दिया।

उन्होंने वैक्यूम ट्यूब में विद्युत क्षेत्र लगाकर जब इन किरणों के विद्युत चुम्बकीय गुण का अध्ययन किया तो उन्हे पता चला कि ये कैनाल किरणें धनात्मक आवेश की होती हैं।

यूजेन गोल्डस्टीन को शक था कि ये किरणे विद्युत चुम्बकीय रेडिएशन की नहीं बल्कि किसी कण की हो सकती हैं इसलिए उन्होंने अपने प्रयोग में छिद्र वाले इलेक्ट्रोड के आगे कुछ इस प्रकार एक गोलाकार पहिया रखा कि अगर कम से कम द्रव्यमान का कोई भी कण इससे टकराए तो यह घूमने लगे।

जब दुबारा किए गए प्रयोग में कैनाल किरणे उत्पन्न हुईं और जाकर पहिए से टकराई तो पहिया घूमने लगा। क्योंकि रेडिएशन के पास इतनी मात्रा में संवेग और ऊर्जा नहीं होती है कि यह पहिए को घुमा सके इसलिए इससे यह तो स्पष्ट हो गया था कि ये किरण कोई रेडिएशन की किरण नहीं बल्कि धनात्मक आवेशित सूक्ष्म कणों की थी।

इस प्रकार यूजेन गोल्डस्टीन (Eugen Goldstein) ने परमाणु से निकलने वाले धनावेशित सूक्ष्म कणों की किरण के बारे में बताया लेकिन गोल्डस्टीन अपने प्रयोगों मे और स्पष्ट तौर पर इससे अधिक कुछ भी नहीं बता सके इसलिए न्यूट्रॉन कि खोज का श्रेय पूर्ण रूप से इन्हे नहीं दिया जाता है।

अर्नेस्ट रदरफोर्ड का प्रयोग (Ernest Rutherford’s Experiment for Discovery of Proton)

इसके बाद सन 1907-1919 में स्वर्ण पत्र प्रयोग के द्वारा रदरफोर्ड ने परमाणु मॉडल दिया तथा पूर्ण रूप से इस धनावेशित चीज को खोज निकाला और बताया कि यह एक धनावेशित सूक्ष्म कण है जो कि हर प्रकार के परमाणु के नाभिक में मौजूद होता है। और उन्होंने इस धनावेशित कण को प्रोटॉन नाम दिया।

उन्होंने यह भी बताया की इस कण पर +e (+ 1.602176634×10−19 C) यानी कि ठीक इलेक्ट्रॉन के बराबर लेकिन धनात्मक प्रकृति का आवेश होता है। साथ ही उन्होंने इस कण के द्रव्यमान की भी गणना की और बताया कि इस कण का द्रव्यमान 1.6726219 × 10-27 किलोग्राम होता है जो कि इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान की तुलना में 1,836 गुना ज्यादा भारी होता है।

रदरफोर्ड के स्वर्ण पत्र प्रयोग (gold foil experiment) के बारे में यहां से पढ़ें।

और बस यहीं से – पूर्ण रूप से प्रोटॉन का पता लगाने और प्रोटॉन के बारे में लगभग सम्पूर्ण जानकारी का पता लगाने और उसका अध्ययन करने के कारण प्रोटॉन की खोज का श्रेय रदरफोर्ड को दिया जाता है। जिन्होंने सन 1907-1919 में अपने स्वर्ण पत्र प्रयोग (gold foil experiment) में परमाणु की संरचना के बारे में और प्रोटॉन के बारे में पता लगाया था।(proton ki khoj kisne ki)

यह भी पढ़ें – न्यूट्रॉन की खोज किसने की थी एवं कैसे की थी

Conclusion

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