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सुपरनोवा क्या है (What is Supernova in hindi)

“अगर संक्षिप्त में सुपरनोवा क्या है (Supernova in hindi) को बताया जाये तो सुपरनोवा धमाके हमारे ब्रह्मांड में होने वाले सबसे बड़े विस्फोट हैं, इन विस्फोटों में इतनी ऊर्जा निकलती है कि ये पूरी गैलेक्सियों में रोशनी कर देते हैं। सुपरनोवा विस्फोट में निकली हुई इस ऊर्जा की मात्रा इतनी अधिक होती है कि यह हमारे सूर्य से पूरी जिंदगी (life-time) में निकली ऊर्जा से भी अधिक होती है”।

आज हम इस आर्टिकल में बात करेंगे हमारे ब्रह्मांड में होने वाले सबसे भयानक एवं उर्जाशील विस्फोट सुपरनोवा विस्फोट के बारे में तो चलिए शुरू करते हैं,आज का ये आर्टिकल सुपरनोवा क्या है (Supernova in hindi)।

supernova kya hai
सुपरनोवा विस्फोट के बाद तारे का बिखराव 

सुपरनोवा विस्फोटों के प्रकार (Types of Supernova in hindi)

मुख्य रूप से सुपरनोवा विस्फोट दो प्रकार के होते हैं

1. टाइप I सुपरनोवा (Type I Supernova)

2. टाइप II सुपरनोवा (Type II Supernova)

यह अच्छा रहेगा अगर हम पहले Type II supernova को समझ लें जिससे हमें Type I supernova को समझने में आसानी होगी।

टाइप II सुपरनोवा (Type II Supernova in hindi)

ये सुपरनोवा विस्फोट तब होते हैं जब अंतरिक्ष में कोई बहुत बड़ा तारा मरता है, ऐसा तारा जिसका द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से करीब 8 गुना से 20 गुना तक अधिक हो।

जैसा की हम अपने पहले आर्टिकल्स में भी बता चुके हैं कि ब्रह्मांड में जब भी कोई नया तारा बनता है तो उसका लगभग 90% से ज्यादा हिस्सा हाइड्रोजन गैस से बना होता है तारों का गुरुत्वाकर्षण बल उन में उपस्थित हाइड्रोजन और अन्य पदार्थों को इसके केंद्र की ओर बहुत ही अधिक बल(force) से खींचता है इस गुरुत्वाकर्षण बल के कारण तारों में उपस्थित हाइड्रोजन व अन्य सभी पदार्थ इसके केंद्र की ओर बहुत ही प्रबलता से खिंचे चले जाते हैं।

जिसके कारण तारों के केंद्र (Core) में इतना अधिक दबाव (Pressure) पैदा होता है एवं इतनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है कि इसके कोर में उपस्थित हाइड्रोजन के परमाणुओं का नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) होने लगता है।

रोचक तथ्य – हाइड्रोजन बम में विस्फोट भी नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) के कारण ही होता है नाभिकीय संलयन के कारण बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा (energy) निकलती है। 】

बहुत अधिक मात्रा में नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) होने के कारण तारों में उपस्थित पदार्थों पर केन्द्र से बाहर की ओर बल लगता है जो कि अंदर की ओर लग रहे गुरुत्वाकर्षण बल का विरोध करता है,

कुछ समय बाद नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) इतनी पर्याप्त मात्रा में होने लगता है कि इसके कारण बाहर को लगने वाला बल अंदर की ओर लग रहे गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित कर देता है और यह तारा एक संतुलित तारा बन जाता है।

जिसके फलस्वरूप इस तारे से बहुत ही बड़ी मात्रा में ऊर्जा, प्रकाश (electromagnetic radiation) निकलता है, एवं यह विशाल गैस का गोला संतुलित अवस्था में तारे के रूप में अरबों सालों तक अंतरिक्ष में चमकने लगता है।

Balance between nuclear fusion and gravitational force in star
Balance between nuclear fusion and gravitational force in star

क्योंकि तारों में  मौजूद हाइड्रोजन (Hydrogen) इनमें होने वाले नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) के लिए ईंधन का कार्य करती है।

इसलिए इन तारों में उपस्थित संपूर्ण हाइड्रोजन संलयन के कारण हिलियम में बदल जाती है। यानी की संपूर्ण हाइड्रोजन के नाभिकीय संलयन के परिणामस्वरूप सारी हाइड्रोजन संलयित (fuse) होकर हीलियम में परिवर्तित हो जाती है।

अब क्योंकि ये तारे अत्यधिक विशाल एवं काफी अधिक द्रव्यमान वाले होते हैं (इन तारों का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान का 8 गुना या उससे अधिक होता है) इसलिए इसके पश्चात इन तारों की ग्रैविटी के दबाव (pressure) के प्रभाव के कारण इनके कोर में हीलियम का भी नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) होने लगता है, यह हीलियम संलयन का कारण कार्बन परमाणु में बदलने लगती है और इस प्रकार यह तारा एक बार फिर संतुलित हो जाता है तथा प्रक्रिया चलती रहती है।

अब यह प्रक्रिया लगातार चलते हुए इतनी आगे बढ़ जाती है कि कार्बन का परमाणु भी संलयित होने से बच नहीं पाता एवं कार्बन परमाणु संलयित (fuse) होकर नियोन में बदल जाता है तथा प्रक्रिया के चलने के साथ साथ नियोन भी संयलित होकर सिलिकन में बदल जाती है।

हालाँकि इन तारों में गुरुत्वाकर्षण का अत्यंत विशाल प्रभाव होता है,  इसलिए इनके कोर पर मौजूद सिलिकन का भी संलयन हो जाता है जो संलयित होकर लोहे (iron) में परिवर्तित हो जाता है।

Elements formed during supernova
 तारे में नाभिकीय संलयन से बनाने वाले तत्त्व

चूंकि तारे के कोर पर बहुत अधिक दबाव (pressure) होता है, इसलिए सिर्फ कोर पर ही संलयन की प्रक्रिया के फलस्वरूप लोहा (iron) बनता है, जैसे-जैसे हम तारे के कोर से बाहर की ओर जाते हैं। तो वहां कम दाब (pressure) होने की वजह से भारी तत्व और अधिक संलयित नहीं हो पाते हैं। इसलिए ही सुपरनोवा विस्फोट (supernova exploasion) से ठीक पहले तारा अलग-अलग तत्वों कि परतों के रूप में मौजूद होता है।

तारे में नाभिकीय संलयन
तारे में नाभिकीय संलयन

चूंकि लोहा (iron) एक भारी एवं स्थिर (stable) तत्व (element) है, जिसकी वजह से यह नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेता है। इसलिए जब तारे के कोर में सभी पदार्थ संलयन की वजह से लोहे (iron) में बदल जाते हैं तब तारे के गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित करने के लिए नाभिकीय संलयन नहीं हो पाता है।

इसलिए संलयन के ना हो पाने के कारण गुरुत्वाकर्षण बल तारे पर पूर्ण रूप से हावी हो जाता है, जो इसकी सतह और इसके पदार्थों को इसके केंद्र की ओर बहुत ही तेज गति से लगभग 25% प्रकाश की चाल से खींचता है, और तारे का संपूर्ण द्रव्यमान बहुत ही छोटे आकार में संकेंद्रित होने लगता है।

जिससे इसके कोर पर इतना अधिक दबाव पड़ने लगता है कि वहां पर उपस्थित लोहे (iron) तथा अन्य पदार्थों के परमाणु(atoms) आपस मे चिपकने लगते हैं, यहां तक कि परमाणुओं में उपस्थित इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटॉन भी आपस में चिपककर न्यूट्रॉन में परिवर्तित होने लगते हैं।

जिसके परिणामस्वरूप तारे के कोर में उपस्थित संपूर्ण पदार्थ एवं उनके परमाणु न्यूट्रॉन में परिवर्तित हो जाते हैं और सारे न्यूट्रॉन आपस में चिपक कर एक न्यूट्रॉन के गोले में परिवर्तित हो जाते हैं। न्यूट्रॉन से निर्मित इस गोले में सभी न्यूट्रॉन आपस में कुछ इस प्रकार चिपके होते हैं की इनके बीच बिल्कुल भी रिक्त स्थान नहीं होता है।

सुपरनोवा विस्फोट

इस प्रकार तारे का नाभिकीय ईंधन (nuclear fuel) खत्म होने के बाद ये कुछ ही सेकंड में अपने मूल आकार से सिकुड़ कर कई गुना छोटा हो जाता है एवं इसके कोर का द्रव्यमान बहुत अधिक बढ़ जाता है।

जिस कारण तारे का घनत्व इतना अधिक हो जाता है कि यह खुद के गुरुत्वाकर्षण बल को भी नहीं सह पाता है जिससे यह भयानक रूप लेते हुए एक बहुत ही बड़े विस्फोट के साथ नष्ट हो जाता है तथा इसके कोर से बाहर के हिस्से में उपस्थित सभी पदार्थ विस्फोट के साथ अंतरिक्ष में उड़ जाते हैं एवं बचता है तो सिर्फ इसके कोर में इकट्ठा न्यूट्रॉन का एक गोला जिसे हम न्यूट्रॉन तारा या न्यूट्रॉन स्टार कहते हैं।

न्यूट्रॉन तारा
न्यूट्रॉन तारा

यह विस्फोट सुपरनोवा (Supernova) कहलाता है, सुपरनोवा (Supernova) विस्फोट हमारे ब्रह्मांड में होने वाले सबसे बड़े एवं खतरनाक विस्फोट हैं इनमे इतनी ऊर्जा तथा प्रकाश निकलता है कि ये पूरी की पूरी गलैक्सियों को कई महीनों तक रोशन कर सकते हैं।

नाभिकीय ईंधन (nuclear fuel) खत्म होते ही तारे के सिकुड़ने, सुपरनोवा धमाका होने तथा इसके न्यूट्रॉन स्टार में बदलने में कुछ ही सेकंड का वक्त लगता है।

इस तरह के विशाल विस्फोट Type II सुपरनोवा विस्फोट या Core-Collapse Supernovas भी कहलाते हैं।

Type II सुपरनोवा को भी दो भागों में बाँटा गया है।

1. टाइप II-L (Type II-L Supernova in hindi)

टाइप II-L (Type II-L) : इस प्रकार के सुपरनोवा विस्फोट के बाद इनसे निकलने वाली ऊर्जा तथा प्रकाश लगातार घटता जाता है व कुछ समय बाद ये ओझल हो जाते हैं।

2. टाइप II-P (Type II-P Supernova in hindi)

टाइप II-P (Type II-P) :  इस प्रकार के सुपरनोवा विस्फोट के बाद इनसे निकलने वाली ऊर्जा तथा प्रकाश लंबे वक्त तक एक ही तीव्रता से निकलता रहता हैं, कई बार तो ये कुछ महीनों तक भी लगातार चमकते हुए दिखाई देते हैं।

न्यूट्रॉन स्टार के कुछ तथ्य – जैसा कि ऊपर बताया गया है,अगर सुपरनोवा धमाके से मरने या नष्ट होने वाले तारे का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान के 8 गुना से 20 गुना तक होता है तो सुपरनोवा विस्फोट के परिणामस्वरूप न्यूट्रॉन स्टार का जन्म होता है और न्यूट्रॉन स्टार बने रहने के लिए इनका घनत्व एकदम उचित होता है। न्यूट्रॉन स्टार हमारे ब्रह्मांड की सबसे अजीब चीजों में से एक हैं, ये अपने छोटे से आकार में सूर्य से भी अधिक द्रव्यमान एवं घनत्व को लिए होते हैं। सामान्यतः ये न्यूट्रॉन स्टार एक छोटे से शहर के आकार के होते हैं लेकिन इनका द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान के 1.18 से 2 गुना तक होता है।

सूर्य के 20 गुना से अधिक के तारों का सुपरनोवा विस्फोट (Supernova explosion of massive stars in hindi)

अगर सुपरनोवा धमाके से मरने या नष्ट होने वाले तारे का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान के 20 गुना से अधिक होता है तो उससे बनने वाले न्यूट्रॉन स्टार का घनत्व (density) इतना ज्यादा होता है, कि वह चंद्रशेखर लिमिट को पार कर जाता है जिसकी वजह से यह न्यूट्रॉन स्टार एक ब्लैक होल में बदल जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो हमारे सूर्य के द्रव्यमान के 20 गुना से अधिक द्रव्यमान वाले तारे सुपरनोवा विस्फोट के परिणामस्वरूप ब्लैक होल में बदल जाते हैं।

ब्लैक होल
ब्लैक होल
image source- NASA
हाइपरनोवा विस्फोट (Hypernova in hindi)

हाइपरनोवा विस्फोट (Hypernova explosion) एक प्रकार के सुपरनोवा विस्फोट ही हैं। जब हमारे सूर्य के द्रव्यमान के 30 गुना से अधिक द्रव्यमान वाले तारे सुपरनोवा विस्फोट से मरते हैं तो इसे हाइपरनोवा विस्फोट कहते हैं।

हाइपरनोवा बेहद ही विनाशकारी, उर्जाशील, खतरनाक एवं हमारे ब्रह्मांड में होने वाले सबसे बड़े विस्फोट हैं।

हाइपरनोवा विस्फोट के परिणामस्वरूप बहुत बड़ा घूमता (rotating) हुआ ब्लैक होल बनता है, जिसे हम सुपर मैसिव ब्लैक होल (Super massive Black hole) के नाम से भी जानते हैं।

इस ब्लैक होल के दोनो ध्रुवों से विद्युतचुम्बकीय विकिरण (electromagnetic radiation) के ऊर्जा भरे जेट्स (energetic jets) बाहर निकलते हैं। तथा यह ब्लैक होल एक अनुवृद्धि डिस्क (accretion disk) से घिरा रहता है।

सुपर मैसिव ब्लैक होल
सुपर मैसिव ब्लैक होल

अतः इस प्रकार सुपरनोवा विस्फोट के फलस्वरूप न्यूट्रॉन स्टार, ब्लैक होल या फिर सुपर मैसिव ब्लैक होल बनते हैं जो कि पूर्ण रूप से मरने वाले तारे के द्रव्यमान पर निर्भर करते हैं।

टाइप I सुपरनोवा (Type I Supernova in hindi)

टाइप I सुपरनोवा मुख्य रूप से बाइनरी स्टार सिस्टम (ऐसा सिस्टम जिसके अंतर्गत दो तारे एक ही केंद्र का चक्कर लगाते हैं) में पाए जाने वाले बौने तारों में होता है।

बाइनरी स्टार सिस्टम
बाइनरी स्टार सिस्टम

जब बाइनरी स्टार सिस्टम में बौना तारा अपने गुरूत्वीय बल से बड़े तारे में मौजूद गैसों व अन्य पदार्थों को लगातार खींचता है और अपने उपर इकट्ठा करते जाता है, इस प्रकार इस तारे पर पदार्थ बढ़ने के साथ उसका गुरुत्वाकर्षण भी बढ़ जाता है, इस प्रकार इसका द्रव्यमान एवं गुरुत्वाकर्षण इतना पर्याप्त हो जाता है कि इसमें नाभिकीय ईंधन (neuclear fuel) खत्म होते ही यह सुपरनोवा विस्फोट बन जाता है।

इसे भी फिर से 3 भागो में बांटा गया है –

1. टाइप I-A (Type I-A Supernova in hindi)

(टाइप I-A) : यह सुपरनोवा पूर्ण रूप से टाइप I की तरह ही होता है।

2. टाइप I-B तथा 3. टाइप I-C (Type I-B and Type I-C Supernova in hindi)

टाइप I-B तथा टाइप I-C : ये सुपरनोवा विस्फोट टाइप II सुपरनोवा विस्फोट की तरह ही होते हैं, बस फर्क ये है कि सुपरनोवा विस्फोट के समय तक इन तारों में हाइड्रोजन पूर्ण रूप संलयित हो जाती है एवं इनमें हाइड्रोजन की बाहरी परत नहीं होती है। जिस वजह से सुपरनोवा के विद्युतचुम्बकीय वर्णक्रम (electromagnetic spectrum) में हाइड्रोजन कि कमी पायी जाती है एवं इन्हे टाइप I की श्रेणी में रख दिया जाता है।

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Conclusion

ब्रह्मांड में मौजूद हमारी ही जैसी अनेकों आकाशगंगा में औसतन हर 50 साल में एक तारा सुपरनोवा बनता है। चूंकि हमारे ब्रह्माण्ड में अरबों खरबों आकाशगंगा हैं अतः ब्रह्माण्ड में हर एक सेकंड में एक या उससे भी अधिक सुपरनोवा धमाके होते रहते हैं।

तो यह थी सुपरनोवा के सम्बंध में सम्पूर्ण जानकारी।

आशा है कि इस लेख “सुपरनोवा क्या है/Supernova kya hai (Supernova in hindi)” के माध्यम से आपको सुपरनोवा के बारे में आपके सभी सवालों के उचित जवाब आप को मिल गए होंगे,

अगर फिर भी आपका कोई सवाल या सुझाव रह गया हो तो हमें Comment Section में जरूर बताएं। 

धन्यवाद।

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