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विटामिन डी परिचय (Introduction to vitamin D in hindi)

हमारा शरीर अनेक पोषक तत्वों के निश्चित मात्रा के मिश्रण की वजह से स्वस्थ बना रहता है इसलिए यदि इन पोषक तत्वों की इस मात्रा में थोड़ा भी बदलाव आए तो यह हमारे शरीर एवं हमारे स्वास्थ्य पर बेहद ही नकारात्मक प्रभाव डालता है। ऐसे ही कुछ बेहद ही महत्वपूर्ण पोषक तत्व विटामिन्स हैं। जो कई प्रकार के होते हैं।

आज इस लेख के माध्यम से हम ऐसे ही एक पोषक तत्व के बारे में जानेंगे,जिसको हम विटामिन डी के रूप में जानते हैं। साथ ही विटामिन डी से जुड़ी हर वह जानकारी जो आपको जाननी चाहिए वह आपको इस लेख के माध्यम से जानने को मिलेगी। Vitamin D in hindi

विटामिन डी क्या है (What is Vitamin D in hindi)

विटामिन डी को विटामिन्स के वर्गीकरण के आधार पर देखा जाए तो पता चलता है कि विटामिन डी एक तरह का वसा में घुलनशील विटामिन है। एवं विटामिन डी का वैज्ञानिक नाम कैलसिफेरॉल (Calciferol) है।

वैज्ञानिकों के अनुसार कई बार विटामिन डी को विटामिन ना मानते हुए  एक तरह का हार्मोन माना जाता है। क्योंकि शरीर द्वारा विटामिन डी का निर्माण, शरीर में इसका स्थानांतरण एवं इसका प्रयोग ठीक उसी प्रकार किया जाता है जिस तरह आमतौर पर शरीर द्वारा हार्मोन्स प्रयोग में लाये जाते हैं।

विटामिन डी का मुख्य रूप से शरीर में कैल्शियम,मैग्नीशियम एवं फॉस्फेट जैसे महत्वपूर्ण तत्वों का अवशोषण कर शरीर के विकास में अहम भूमिका निभाता है।

विटामिन डी का निर्माण (Formation of Vitamin D in hindi)

मुख्य रूप से विटामिन डी दो प्रकारों में पाया जाता है विटामिन डी 3 एवं विटामिन डी 2 . चूंकि मुख्य रूप से विटामिन डी 3 मनुष्यों में तथा विटामिन डी 2 पौधों में पाया जाता है। अतः मनुष्यों के लिए सक्रिय विटामिन डी के निर्माण में विटामिन डी 2 की कोई भूमिका नहीं है।

• विटामिन डी 3 (Vitamin D3 in hindi)

हम जानते हैं कि मनुष्यों में विटामिन डी का सबसे अधिक निर्माण सूर्य से आने वाली UV – किरणों के कारण होता है। सूर्य से आने वाली UV – किरण मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं। UV-A एवं UV-B. हमारे शरीर में विटामिन डी का निर्माण UV-B किरण के कारण ही हो पाता है।

जब UV-B किरण हमारी त्वचा पर पड़ती है तो त्वचा की निचली सतह पर मौजूद 7- डिहाइड्रोकोलेस्ट्रॉल (7-dehydrocholesterol) नामक रसायनिक पदार्थ से क्रिया कर कोलेकैल्सिफेरोल विटामिन (cholecalciferol vitamin) का निर्माण करती है, जिसे हम सामान्य भाषा में विटामिन डी 3 के रूप में जानते हैं।

यह निर्मित विटामिन डी 3 आगे चलकर यकृत (liver) से गुजरने के पश्चात कैल्सिफेडिओल (calcifediol) नामक रसायन का निर्माण करता है, जिसे 25 – हाइड्रोक्सी कोलेकैल्सिफेरोल (25-hydroxy cholecalciferol) के रूप में जाना जाता है।

कैल्सिफेडिओल को आगे चलकर किडनी एवं प्रतिरक्षा तंत्र की कुछ कोशिकाओं द्वारा कैल्सिट्राइओल (calcitriol) में बदल दिया जाता है। जिसे रसायन विज्ञान में 1,25 – डाइहाइड्रोक्सी कोलेकैल्सिफेरोल (1,25 – dihydroxy cholecalciferol) के रूप में जाना जाता है।

यह कैल्सिट्राइओल ही असल में सक्रिय विटामिन डी होता है। जो हार्मोन्स की ही भाँति रक्त में प्रसारित होकर शरीर में कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं फॉस्फेट जैसे तत्वों की मात्रा का सही तरह से नियंत्रण करता है।

इस सब से हम ये तो जान चुके हैं कि हमारे शरीर में विटामिन डी का निर्माण किस प्रकार होता है, लेकिन इसके साथ साथ हमारा यह जानना भी अति आवश्यक है कि शरीर में विटामिन डी के पर्याप्त मात्रा में निर्माण होने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा यकृत (liver) एवं हमारी किडनीयाँ (kidneys) पूर्ण रूप से स्वस्थ होनी चाहिए। क्योंकि शरीर में विटामिन डी के निर्माण में सबसे बड़ा योगदान इन्हीं अंगों का है।

नोट- चूँकि शरीर में विटामिन डी का निर्माण होने के लिए शरीर के कई तरह के अलग अलग अंगों की सहभागिता होती है जिनमें विभिन्न तरह की क्रियाओं के पश्चात इसका निर्माण होता है, जो कि हार्मोन के निर्माण एवं प्रयोग से मेल खाता है इसलिए इस विटामिन को हार्मोन भी माना जाता है।

शरीर में विटामिन डी के फायदे व कार्य (Benefits of Vitamin D in Hindi)

1. शरीर के विकास में विटामिन डी का कार्य (In the development of the Body)

शरीर में विटामिन डी के अनेक कार्य हैं जिनमें से इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य रक्त में कैल्शियम एवं फॉस्फोरस जैसे तत्वों की मात्रा को नियंत्रित करना है। चूँकि कैल्शियम एवं फॉस्फोरस जैसे तत्वों द्वारा

हड्डियों एवं दाँतों का निर्माण किये जाने के कारण इनका बहुत बड़ा योगदान हमारे शरीर के विकास में है। इसलिए इनकी मात्रा में आए छोटे से बदलाव से भी शरीर को अनेक भयानक रोगों का सामना करना पढ़ता है।

मुख्य रूप से रक्त में कैल्शियम के स्तर को नियंत्रित करने के लिए तीन तरह के हार्मोन्स काम में आते हैं –

(a) पैराथाइरॉइड हार्मोन (Parathyroid Hormone) – रक्त में कैल्शियम की मात्रा को नियंत्रित करता है।

(b) विटामिन डी (कैल्सिट्राइओल) – रक्त में कैल्शियम, फॉस्फेट एवं मैग्नीशियम की मात्रा नियंत्रित करने के साथ साथ हड्डीयों एवं दाँतों के विकास में सहायता।

(c) कैल्सिटोनिन (Calcitonin) – रक्त में कैल्शियम एवं फॉस्फेट के स्तर को नियंत्रित करता है। मुख्य रूप से पैराथाइरॉइड हार्मोन के विपरीत कार्य करता है। अतः रक्त में मौजूद अधिक कैल्शियम की मात्रा को घटाता है।

जब शरीर को आहार के द्वारा पूर्ण रूप से कैल्शियम नहीं मिल पाता है एवं यदि शरीर में विटामिन डी की कमी के कारण छोटी आँत आहार से पूर्ण रूप से कैल्शियम को अवशोषित नहीं कर पाती है तो इन स्थितियों में रक्त में कैल्शियम तथा फॉस्फेट की मात्रा कम हो जाती है जिसके कारण रक्त में कैल्शियम की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए शरीर में पैराथाइरॉइड हार्मोन की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है।

अतः यह हार्मोन हड्डियों से कैल्शियम निकालकर रक्त में उसके स्तर को नियंत्रित करता है परंतु इस प्रक्रिया के कारण हड्डियाँ बेहद ही कमजोर हो जाती हैं। साथ ही कई बार बच्चों में इस कारण से हड्डियों के साथ साथ शरीर का विकास भी रुक जाता है।

अतः शरीर के विकास के लिए विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा अति आवश्यक है, यदि शरीर में विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा है तब विटामिन डी छोटी आँत को इस प्रकार प्रभावित करता है कि आहार से पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम का अवशोषण कर सके। जिस कारण रक्त में कैल्शियम की मात्रा नियंत्रित रहती है एवं साथ ही हड्डीयों का भी क्षय नहीं होता है।

2. रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में (To Enhance immunity)

कई तरह के प्रयोगों के बाद यह पाया गया कि विटामिन डी हमारे शरीर  में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता है।

हमारे शरीर में दो अहम एंटी माइक्रोबियल प्रोटीन होते हैं, कैथेलाइडिन (cathelicidin) और डिफेंसिन (defensins) जिनका कार्य शरीर को विभिन्न प्रकार के विषाणु जनित रोगों,एलर्जी, जीवाणु एवं अनेक संक्रामक रोगों से बचाना तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाये रखना होता है।

शरीर में विटामिन डी की उचित उपस्थिति इन एंटी माइक्रोबियल प्रोटीन कैथेलाइडिन (cathelicidin) और डिफेंसिन्स (defensins) की मात्रा को नियमित करता है। अतः हम बाहरी स्रोतों से विटामिन डी को ग्रेन करने से एवं शरीर में इसकी मात्रा बढ़ाने से हम शरीर पर इन प्रोटीन्स की मात्रा को बढ़ा भी सकते हैं। जिसका सीधा असर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ेगा यानी की हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाएगी।

कई शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि विटामिन डी प्रतिरोधक प्रणाली की अहम कोशिकाओं जिन्हें t cells नाम से जाना जाता है की मात्रा को बढ़ाने में भी मदद करता है। ये t cells शरीर को कई तरह के रोगों से बचाव में कार्य करती हैं।

इस प्रकार विटामिन डी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता है।

3. महत्वपूर्ण अंगों को कैंसर की की चपेट से बचाने में (In cancer prevention to some vital organs)

कई अध्ययनों के माध्यम से वैज्ञानिक ये जान पाए हैं कि शरीर में विटामिन डी की उचित मात्रा होने पर यह शरीर में विभिन्न तरह के कैंसर जैसे – स्तन कैंसर (breast cancer), प्रोस्टेट कैंसर (prostet cancer), बड़ी आँत का कैंसर (colon cancer), रक्त कैंसर (blood cancer), फेफड़ों के कैंसर (lung cancer), अग्न्याशयी कैंसर (pancreatic cancer) आदि ऐसे ही कुल 32 – 35 तरह के कैंसर के होने के खतरे को कई हद तक घटा देता है।

यदि व्यक्ति के शरीर के किसी अंग में कैंसर है तो कैंसर युक्त कोशिकाओं का विकास अनियंत्रित रूप से बढ़ता जाता है,एवं इन कोशिकाओं के अनियमित विकास के कारण धीरे धीरे शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं की मृत्यु हो जाती है जिस कारण कैंसर व्यक्ति के लिए जानलेवा बीमारी बन जाता है।

लेकिन शरीर में विटामिन डी की उचित मात्रा होने से विटामिन डी न केवल कैंसर युक्त कोशिकाओं के विकास को रोकता है बल्कि स्वस्थ कोशिकाओं के मरने की दर को भी घटा देता है। कई शोध में यह भी देखा गया है कि विटामिन डी कैंसर युक्त कोशिकाओं को नष्ट करने में भी सफल हुआ है।

इसके अलावा शरीर में उतपन्न होने वाले ट्यूमर को भी खत्म करने में विटामिन डी की अहम भूमिका पाई गयी है।

4. स्वस्थ मस्तिष्क के विकास में (In development of healthy brain)

हमारे मस्तिष्क को स्वस्थ एवं सुचारू रूप से कार्यकारी होने के पीछे विटामिन डी की भी अहम भूमिका है।कई शोधों में पाया गया है कि  विटामिन डी की कमी के कारण मष्तिष्क में स्मरणशक्ति को बनाने वाले हिस्से यानी कि हिप्पोकैम्पस (hippocampus) में पेरिन्यूरेनल नेट्स (perineuronal nets) की मात्रा में बड़ी गिरावट देखने को मिलती है। जिस  कारण व्यक्ति की स्मरण क्षमता के साथ साथ उसकी नई जानकारियों को सीखने की शक्ति में भी बड़ी गिरावट आती है।

पेरिन्यूरेनल नेट्स (perineuronal nets) मस्तिष्क में एक चबूतरे की तरह कार्य करता है जो न्यूरॉन्स एवं उनके बीच सम्पर्कों को स्थिर रखने का कार्य करता है। ताकि मस्तिष्क की क्षमता बढ़ती रहे।

एवं शरीर में विटामिन डी इन पेरिन्यूरेनल नेट्स (perineuronal nets) की संख्या को नियंत्रित करने के साथ साथ इनको स्थिर रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। जिस कारण से मस्तिष्क स्वस्थ रहता है साथ ही व्यक्ति की स्मरणशक्ति एवं सीखने की क्षमता में भी बढ़ावा देखने को मिलता है।

विटामिन डी के इन उपयोगों के अलावा भी विभिन्न उपयोग हैं जैसे – ह्रदय सम्बन्धी रोगों से बचाव में, डायबिटीज जैसे से बचाव में, डिप्रेशन से बचाव में, थायराइड ग्रन्थि को स्वस्थ रखने में आदि।

विटामिन डी की कमी से रोग (Disease generated by deficiency of Vitamin d in Hindi)

अग्रलिखित लेख के माध्यम से आप शरीर में विटामिन डी की अहमीयतता को जान चुके होंगे। अतः शरीर में इस महत्वपूर्ण विटामिन की कमी से होने वाले रोग मुख्य रूप से हड्डियों से सम्बंधित होते हैं तो चलिए अब इन रोगों के बारे में भी जान लेते हैं।

1. रिकेट्स (Rickets)

सामान्य रूप से 6 से 36 महीने की उम्र वाले बच्चों में देखी जाने वाली यह बीमारी विटामिन डी की कमी के कारण होती है, इस रोग के कारण बच्चों के शरीर में कैल्शियम एवं फॉस्फोरस की मात्रा में आने वाली कमी के कारण उनकी हड्डियाँ बेहद ही कमजोर एवं कोमल हो जाती हैं।

चूँकि यह उम्र बच्चों के तीव्र विकास के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है, लेकिन विटामिन डी की कमी के कारण हड्डीयों से सम्बंधित इस बीमारी (रिकेट्स) के करण ऐसे बच्चों के शरीर का विकास भी कई हद तक रुक जाता है एवं कुछ हड्डियाँ बेहद ही विचित्र आकार ले लेती हैं जिससे कई बच्चों के शरीर का ढाँचा बिगड़ जाता है।

2. अस्थिमृदुता (Osteomalacia)

शरीर में विटामिन डी की कमी के कारण हड्डियों में आने वाली यह कमजोरी वयस्क मनुष्यों में भी पाई जाती है, लेकिन वयस्कों के लिए यह बीमारी अस्थिमृदुता (Osteomalacia) नाम से जानी जाती है। हालाँकि अस्थिमृदुता (Osteomalacia) कई बार बच्चों में भी देखी जाती है।

हड्डीयों में होने वाली इस बीमारी का कारण शरीर में विटामिन डी की मात्रा में आने वाली कमी के फलस्वरूप विभिन्न तरह के खनिजों जैसे – कैल्शियम, पोटैशियम एवं मैग्नीशियम की कमी होती है।

क्योंकि हम जानते हैं कि इन खनिजों के कारण ही हड्डीयों को कठोरपन मिलता है इसलिए खनिजों की कमी के कारण वयस्कों की हड्डियाँ बेहद ही मुलायम हो जाती हैं जिससे एक हल्की सी चोट से भी हड्डियों के टूटने का खतरा बन जाता है। साथ ही साथ इस बीमारी के कारण हड्डीयों में अक्सर दर्द होता है एवं कई बार मांसपेशियाँ भी कमजोर हो जाती हैं।

3. ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis)

ऑस्टियोपोरोसिस भी हड्डी सबंधी रोग है जो विटामिन डी की कमी के कारण ही होता है।

चूँकि शरीर के विकास के दौरान पुरानी हड्डीयों का नई हड्डियों में रूपांतरण एक आम बात है जिस प्रक्रिया में पुरानी हड्डी के नष्ट होने की दर नई हड्डी के बनने की दर से काफी धीमी होती है।

परन्तु शरीर में विटामिन डी की कमी के कारण शरीर में पनपने वाली इस बीमारी के कारण हड्डीयों के रूपांतरण प्रक्रिया में पुरानी हड्डियों के नष्ट होने की दर नई हड्डीयों के बनने की दर से कई अधिक हो जाती है जिस कारण शरीर में हड्डीयों के द्रव्यमान में बेहद ही कमी देखने को मिलती है साथ ही हड्डीयों के घनत्व में भारी गिरावट आती है जिस कारण से हड्डियाँ बेहद ही कमजोर हो जाती हैं।

यह बीमारी पुरुषों के मुकाबले आम तौर पर महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती है। एक शोध के अनुसार लगभग 3 में से 1 महिला इस बीमारी से ग्रसित होती है। श्वेत एवं एशियाई लोगों में इस बीमारी के होने का अधिक खतरा रहता है।

विटामिन डी की कमी का कारण (Deficiency of Vitamin D in Hindi)

शरीर में होने वाली विटामिन डी की कमी के कुछ महत्वपूर्ण कारण निम्न हैं –  

  • हम जानते हैं कि सूर्य विटामिन डी का सबसे बड़ा एवं अहम स्रोत है,अतः वर्तमान में भागदौड़ भरी इस जीवन शैली में अधिकतर लोग अक्सर सूर्य की रोशनी नहीं ले पाते हैं, जिस कारण से उनके शरीर में विटामिन डी कमी पाई जाती है।
  • मनुष्य की त्वचा का रंग जो कि त्वचा में पाए जाने वाले मेलेनिन नामक पदार्थ से निर्धारित किया जाता है।
  • त्वचा में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के मेलेनिन के कारण भी सूर्य से आने वाली रोशनी की बड़ी मात्रा को विटामिन डी बनाने से रोक लिया जाता है।
  • काली त्वचा के लोगों में गहरा एवं काफी मोटा मेलेनिन पाया जाता है जो यूमेलेनिन (Eumelanin) नाम से जाना जाता है, यह त्वचा पर पढ़ने वाली सूर्य की रोशनी का बहुत बड़े हिस्से को विटामिन डी बनाने से रोक लेता है, इसलिए काली त्वचा के लोगों को सामान्य से अधिक सूर्य की रोशनी लेनी चाहिए।
  • यही कारण है जिससे आमतौर पर काली त्वचा के लोगों में विटामिन डी की कमी देखी जाती है।
  • हल्के रंग की त्वचा में लगभग न के बराबर मेलेनिन होने के कारण ऐसे लोगों को बेहद ही कम सूर्य की रोशनी लेने से भी विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा प्राप्त हो जाती है।
  • हम जानते हैं कि विटामिन डी को उसके सक्रिय रूप में बदलने में व्यक्ति के लीवर और किडनी की अहम भूमिका रहती है, लेकिन यदि व्यक्ति लीवर और किडनी के रोगों से ग्रसित है तो यह भी एक बहुत बड़ा कारण होता है जिससे शरीर में विटामिन डी की कमी देखने को मिलती है।
  • इन कारणों के अलावा एक कारण सही आहार का सेवन न करना भी है, ऐसे आहार जिनसे शरीर को कैल्शियम मिलता का सेवन न करने से भी अक्सर लोगों में विटामिन डी की कमी देखी जाती है।

विटामिन डी के कमी के लक्षण (Deficiency of Vitamin D in Hindi)

  • अक्सर बीमार या संक्रमित होना।
  • शरीर में लगातार थकान का बने रहना।
  • अत्यधिक डिप्रेशन में रहना।
  • घाव भरने की प्रक्रिया में गड़बड़ी।
  • हड्डीयों एवं मांशपेशियों में दर्द रहना।
  • अत्यधिक बालों का गिरना।
  • पाचन व्यवस्था का सही रूप से कार्य न करना।

विटामिन डी के स्रोत (Source of vitamin d in hindi)

विटामिन डी के आहार (Vitamin D Rich Foods in Hindi)

हम जानते हैं कि शरीर को विटामिन डी की सबसे अधिक मात्रा सूर्य की रोशनी से ही मिल पाती है, लेकिन शरीर को विटामिन डी की कमी से बचाने के लिए सूर्य की रोशनी के अलावा बहुत से आहार भी हैं जिनकी मदद से भी शरीर में विटामिन डी की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है।

1. विटामिन डी के शाकाहारी आहार (Vegetarian Source of Vitamin D in Hindi)

Vegetarian Source of Vitamin D in Hindi

(a) मशरूम (mushrooms) – सीधे सूर्य की रोशनी में उगने वाले मशरूम विटामिन डी के बेहद ही अच्छे स्रोत होते हैं।अलग अलग प्रकार के मशरूम विटामिन डी बढ़ाने में सक्षम रहते हैं।

(b) पनीर (Cheese) – पनीर बहुत से पोषक तत्वों की ही तरह विटामिन डी का एक अच्छा स्रोत है जो शाकाहारी आहार के रूप में एक अच्छा उपाय है।

(c) कृत्रिम रूप से मिलाये गए पोषक तत्व वाले आहार (Fortified foods) –  वे आहार जिनमें सामान्य रूप से कम मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं लेकिन विज्ञान की मदद से उनमें कृत्रिम रूप से जरूरी एवं आवश्यक पोषक तत्व मिला दिए जाते हैं, इस तरह के पोषक तत्वों में विटामिन डी का भी प्रयोग किया जाता है जिससे कई तरह के आहार इस प्रक्रिया के बाद बड़ी मात्रा में विटामिन डी के अच्छे स्रोत बम जाते हैं ऐसे ही कुछ आहार निम्न हैं –

  • गाय का दूध (कृत्रिम रूप से पोषक तत्व मिलाने के पश्चात)
  • दही (कृत्रिम रूप से पोषक तत्व मिलाने के पश्चात )
  • ओट्स (कृत्रिम रूप से पोषक तत्व मिलाने के पश्चात)
  • संतरे का जूस (कृत्रिम रूप से पोषक तत्व मिलाने के पश्चात)
  • बादाम का दूध (कृत्रिम रूप से पोषक तत्व मिलाने के पश्चात)

2. विटामिन डी के मांसाहारी आहार (Non vegetarian source of Vitamin D in Hindi)

(a) मछलीयाँ (fishes) – विटामिन डी के अच्छे मांसाहारी आहारों में बहुत सी मछलियाँ हैं जिनमें अत्यधिक मात्रा में विटामिन डी पाया जाता है –

  • रावस या साल्मन मछली (600 से 1300 आई.यू. प्रति 100 ग्राम)
  • वाशी या सार्डिन मछली ( 119 से 390 आई.यू. प्रति 100 ग्राम)
  • हिलसा या हैरिंग मछली (112 से 230 आई.यू. प्रति 100 ग्राम)
  • चुरा या ट्यूना मछली (274 आई.यू. प्रति 100 ग्राम)

(b) रोहू मछली के लीवर का तेल (Cod liver oil) – रोहू मछली के लीवर के तेल का प्रयोग कई सालों से बच्चों को विटामिन की कमी से बचाने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह तेल विटामिन डी की एक बड़ी मात्रा को समेटे हुए है। इस तेल की 1 चम्मच से करीब 454 आई.यू. तक विटामिन डी प्राप्त होता है।

(c) अंडे की जर्दी (Egg yolk) – अन्य कई महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के अलावा अंडा विटामिन डी का भी एक बहुत अच्छा स्रोत है, सामान्य रूप से अंडे की एक जर्दी में करीब 42 आई.यू. तक विटामिन डी पाया जाता है।

परन्तु यदि मुर्गी को दिए जाने वाले आहार में विटामिन डी की मात्रा का ध्यान दिया जाए तो एक अंडे की जर्दी में मौजूद विटामिन डी को कई गुना तक बढ़ाया जा सकता है।

विटामिन डी साइड इफेक्ट (Side Effects of Vitamin D in Hindi)

शरीर में विटामिन डी की आवश्यकता को हम जान चुके हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर कई बार को बाहरी आहारों या दवाइयों के अत्यधिक सेवन से शरीर में विटामिन डी की मात्रा अत्यधिक हो जाती है,जिस कारण से शरीर में कई तरह के रोग के पनपने का खतरा बन जाता है, शरीर में विटामिन डी की अत्यधिक मात्रा की वजह से होने वाले कुछ महत्वपूर्ण रोग निम्न हैं –

(I) हाइपरकैल्शिमिया (hypercalcemia) – विटामिन डी की अधिकता के कारण शरीर में कैल्शियम की मात्रा बेहद ही अधिक बढ़ जाती है जिस कारण से शरीर में कई गंभीर परेशानियाँ उतपन्न हो जाती हैं, जैसे – पेट दर्द,थकान,लगातार पेशाब आना आदि

(II) पाचन सम्बन्धी (Digestion related) – शरीर में विटामिन डी को अवशोषित करने में लीवर का बहुत बड़ा योगदान रहता है लेकिन

यदि शरीर में विटामिन डी की मात्रा अधिक है तो इस कारण से कई बार लीवर में बहुत सी परेशानियाँ आ जाती हैं जिन कारणों से व्यक्ति को पाचन सम्बन्धी परेशानियाँ देखने को मिलती हैं। जो कई बार गम्भीर रूप भी ले लेती हैं।

(III) अस्थि क्षय (bone loss) – जिस प्रकार विटामिन डी की कमी से से हड्डीयाँ कमजोर हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार यदि शरीर में विटामिन डी की मात्रा अधिक हो जाये तो उससे भी हड्डीयों के कमजोर होने का खतरा बन जाता है।

चूँकि शरीर में विटामिन k2 का कार्य हड्डीयों में कैल्शियम को बनाये रखना तथा रक्त में बढ़ी हुई कैल्शियम की मात्रा को कम करना होता है,परन्तु शरीर में विटामिन डी की अत्यधिक मात्रा के कारण  शरीर में विटामिन के2 की गतिविधियों में कमी आ जाती है जिस कारण से शरीर में हड्डीयों में क्षय देखने को मिलता है

(IV) किडनी की खराबी (kidney failure) – ठीक लीवर की ही तरह किडनी भी शरीर में विटामिन डी के अवशोषण में बहुत बड़ा योगदान निभाती हैं, परन्तु यदि शरीर में विटामिन डी की मात्रा अत्यधिक हो जाये तो किडनी में भी कई तरह के रोगों के पनपने का खतरा बन जाता है।

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निष्कर्ष (Conclusion)

इस लेख के माध्यम से हमने आपको विटामिन डी के महत्त्व से सम्बंधित हर एक प्रश्न का जवाब देने की कोशिश की है आशा है विटामिन डी (Vitamin D in Hindi) से सम्बंधित आपके सारे सवालों का जवाब आपको मिल चुका होगा, लेकिन इस सम्पूर्ण लेख को पढ़ने के बाद भी यदि आपके जिज्ञासु मस्तिष्क में कोई प्रश्न रह गया हो तो आप हमें कमेन्ट सेक्शन के जरिये पूछ सकते हैं, हम आपको जवाब देने की पूरी कोशिश करेंगे।

इसके अलावा यदि आपका कोई सुझाव भी हो तो हमें कमेन्ट सेक्शन में बताऐं साथ ही इस लेख को अधिक से अधिक लोगों के साथ शेयर करें।

                                                                          धन्यवाद।।।

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